| تـأوب هـمـي والفـؤاد كئـيب | * | وأرق عيـنـي والـرقاد غـريب |
| تـزلـزلت الدنـيـا لآل محمـد | * | وكادت لهـم صمم الجبال تـذوب |
| فـمـن مبلغ عني الحسين رسالة | * | وإن كـرهـتها أنـفـس وقـلوب |
| قتيل بلا جـرم كـأن قمـيـصه | * | صبيغ بماء الارجـوان خـضيب |
| نصلي على المختار من آل هاشم | * | ونـؤذي بـنيـه إن ذاك عجـيب |
| لـئـن كان ذنـبي حب آل محمد | * | فذلك ذنب لـسـت عـنه أتـوب |
| هـم شفعائي يوم حشري وموقفي | * | وبـغـضهـم للشافعـي ذنـوب |